ॐ जय जगदीश हरे आरती

यह आरती श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा लगभग 1870 में रची गई मानी जाती है और आज घर-घर तथा मंदिरों में गाई जाती है।

आरती के बोल अलग-अलग छपे संस्करणों में थोड़े भिन्न मिलते हैं। यहाँ एक प्रचलित पाठ दिया गया है।

टेक (मुखड़ा)

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

अर्थ: हे जगदीश्वर हरि, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों के संकट क्षण भर में दूर कर देते हैं।

पद 1

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।स्वामी दुःख विनसे मन का।सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है और उसके मन के दुःख मिट जाते हैं। घर में सुख-संपत्ति आती है और शरीर के कष्ट दूर होते हैं।

पद 2

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं और किसकी शरण में जाऊँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा करूँ।

पद 3

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।स्वामी तुम अन्तर्यामी।पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: आप पूर्ण परमात्मा और अंतर्यामी हैं। आप परब्रह्म, परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।

पद 4

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।स्वामी तुम पालन-कर्ता।मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: आप करुणा के सागर और पालनहार हैं। मैं मूर्ख, दुष्ट और कामनाओं में डूबा हूँ। हे स्वामी, मुझ पर कृपा कीजिए।

पद 5

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: आप एक हैं, इंद्रियों की पहुँच से परे हैं और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मुझ कुबुद्धि को आप कैसे मिलेंगे?

पद 6

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।स्वामी तुम ठाकुर मेरे।अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: हे दीनों के बंधु, दुखों को हरने वाले, आप मेरे स्वामी हैं। अपना हाथ बढ़ाइए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।

पद 7

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।स्वामी पाप हरो देवा।श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: मेरे विषय-विकार मिटाइए और पाप हर लीजिए, हे देव। श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए तथा संतों की सेवा का अवसर दीजिए।

पद 8

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।स्वामी जो कोई नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ: जो कोई भी श्री जगदीश जी की यह आरती गाता है, उसे सुख और संपत्ति मिलती है। (इस पाठ में अंतिम पद में शिवानंद स्वामी का नाम आता है।)

स्रोत और टिप्पणी

मूल रचना सार्वजनिक (public domain) है। अर्थ हमारे अपने शब्दों में हैं।

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