जीवन की समस्याओं के लिए गीता के श्लोक

भगवद्गीता के ये श्लोक कर्म, समता, क्रोध, मन पर नियंत्रण और आत्मबल जैसे विषयों पर हैं। संस्कृत मूल पाठ सार्वजनिक (public domain) है।

अध्याय 2, श्लोक 14

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

अर्थ: हे कुन्तीपुत्र, इंद्रियों का विषयों से संयोग सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देने वाला है। ये आते-जाते रहते हैं और अनित्य हैं। हे भारत, इन्हें सहन करो।

अध्याय 2, श्लोक 47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थ: तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तू कर्म के फल का कारण मत बन, और कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति न हो।

अध्याय 2, श्लोक 48

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय ।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

अर्थ: हे धनंजय, आसक्ति छोड़कर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म कर। यही समता 'योग' कहलाती है।

अध्याय 2, श्लोक 62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

अर्थ: विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।

अध्याय 2, श्लोक 63

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

अर्थ: क्रोध से मोह होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रम से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है।

अध्याय 3, श्लोक 35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

अर्थ: अच्छी तरह निभाए गए दूसरे के धर्म से अपना धर्म, भले ही गुणरहित हो, श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है; दूसरे का धर्म भयावह है।

अध्याय 4, श्लोक 7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

अर्थ: हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आप को प्रकट करता हूँ।

अध्याय 6, श्लोक 5

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

अर्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को गिरने न दे, क्योंकि आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु है।

अध्याय 6, श्लोक 6

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

अर्थ: जिसने अपने आप को जीत लिया है, उसके लिए आत्मा मित्र है। जिसने स्वयं को नहीं जीता, उसके लिए वही आत्मा शत्रु की तरह व्यवहार करती है।

अध्याय 6, श्लोक 35

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

अर्थ: हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। परंतु हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है।

अध्याय 18, श्लोक 66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

अर्थ: सब धर्मों को छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत कर।

स्रोत और टिप्पणी

संस्कृत पाठ विकिस्रोत से लिया गया है। अर्थ हमारे अपने शब्दों में हैं, किसी प्रकाशित अनुवाद की प्रति नहीं।

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